Wednesday, March 25, 2015

साल 2014 रहा भारत की महिला खिलाड़ियों नाम
साल 2014 भारत की महिला खिलाड़ियों के लिए उपलब्धियों भरा साबित हुआ। इस साल 2 बड़े खेलों राष्ट्रमंडल खेल (ग्लासगो) और एशियाई खेलों (इंचियोन) का आयोजन किया गया जिसमें भारतीय महिला खिलाड़ियों ने सफलता के कई झंडे गाड़े। राष्ट्रमंडल खेलों में महिला खिलाड़ियों ने दमदार प्रदर्शन किया और देश के पुरुष खिलाड़ियों को बराबरी की टक्कर दी। भारत ने यहां कुल 15 स्वर्ण, 30 रजत और 19 कांस्य पदक जीते, जिसमें पुरुष खिलाड़ियों ने 9 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य सहित कुल 35 पदक जीते। वहीं, महिला खिलाड़ियों ने 6 स्वर्ण, 13 रजत और 10 कांस्य सहित कुल 29 पदक जीते। पुरुष और महिला खिलाड़ियों के ओवरऑल प्रदर्शन में सिर्फ 6 पदकों का फासला रहा। वहीं यही एशियाई खेलों में भारत ने 11 स्वर्ण, 10 रजत समेत कुल 57 पदक जीते जिसमें महिला खिलाड़ियों ने 5 स्वर्ण, 4 रजत और 18 कांस्य पदक जीते। सानिया मिर्जा, देश की सबसे सफल महिला टेनिस खिलाड़ी। उनके लिए यह साल थोड़ा विवादों से घिरा रहा लेकिन कोर्ट पर उन्होंने जबर्दस्त कामयाबी हासिल की।

सानिया ने साल के चौथे ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट अमेरिकी ओपन में मिश्रित युगल जीता जो उनके करियर का तीसरा मेजर युगल खिताब है। इससे पहले वह ऑस्ट्रेलियन ओपन (2009) और फ्रेंच ओपन (2012) जीत चुकी हैं।

अमेरिकी ओपन में ब्रूनो सोयर्स के साथ मिश्रित युगल का खिताब जीतने के बाद सानिया ने जिंबाब्वे की कारा ब्लैक के साथ जोड़ी बनाते हुए डब्‍ल्यूटीए टूर फाइनल्स का खिताब भी जीत लिया। डब्‍ल्यूटीए टूर फाइनल्स जीतने वाली वह भारत की पहली महिला खिलाड़ी बनीं। वहीं, उन्होंने एशियाड में पहले खेलने से इनकार करने के बाद खेलने का मन बनाया और मिश्रित युगल में साकेत मायेनी के साथ स्वर्ण पदक जीता और फिर महिला युगल में कांस्य भी हासिल किया।

5 बार की वर्ल्ड चैंपियन महिला मुक्केबाज एमसी मैरीकॉम ने इस साल भी सफलता का परचम लह‌राया। वह दुनिया की एकमात्र ऐसी महिला मुक्केबाज हैं जिन्होंने 6 वर्ल्ड चैंपियनशिप में पदक जीते जिसमें 5 तो खिताब ही शामिल है।
2010 में खेले गए ग्‍ंवाझू एशियाड में कांस्य पदक जीतने वाली मैरीकॉम ने इस बार इंचियोन एशियाई खेलों की फ्लाइवेट वर्ग में गोल्ड हासिल कर देश को पीला तमगा दिलाया। एशियाड में स्वर्ण जीतने वाली वह भारत की पहली महिला मुक्केबाज बनीं।
रिंग के बाहर भी उनके लिए यह साल बेहद शानदार रहा, उनकी जीवन और संघर्षों पर आधारित फिल्म 'मैरीकॉम' रिलीज हुई। इस फिल्म की नायिका प्रियंका चोपड़ा थीं जिन्होंने मैरीकॉम का रोल निभाया। यह फिल्म हिट रही।
देश की सबसे खूबसूरत और बेहतरीन महिला खिलाड़ियों में गिना जाता है दीपिका पल्लीकल को। उन्होंने इस साल देश के लिए कई कामयाबियां हासिल की। ग्लासगो राष्ट्रमंडल में उन्होंने जोशना चिनप्पा के साथ मिलकर स्‍क्वैश्‍ा में महिला युगल का स्वर्ण जीता।
स्‍क्वैश में गोल्डन सफलता के साथ-साथ भारत का राष्ट्रमंडल खेलों में इस स्पर्धा से यह पहला पदक भी है। महिला युगल मुकाबले में भारतीय टीम की जीत इस लिहाज ऐतिहासिक है क्योंकि उसने फाइनल में इंग्लैंड की वर्ल्ड नंबर वन जोड़ी को हराया। पांचवी वरीयता प्राप्त दीपिका और जोशना की जोड़ी ने इंग्लैंड की जोड़ी को बेहद आसान मुकाबले में 11-6, 11-8 से हराकर देश को इस खेल का पहला गोल्ड दिलाया। दिलचस्प यह रहा कि राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास में इस स्पर्धा में भारत का अब तक यह‌पहला पदक भी है।

इसके बाद दीपिका ने एशियाई खेलों के भा शानदार प्रदर्शन किया और सेमीफाइनल में पहुंचकर कांस्य पदक जीता। वह दोनों बड़े गेम्स में स्‍क्वैश में पदक जीतने वाली भारत की पहली खिलाड़ी बनी। फरवरी, 2010 में वह दुनिया की शीर्ष 10 खिलाड़ियों की सूची में फिर से शामिल हुईं। शीर्ष 10 के अंदर पहुंचने वाली वह भारत की पहली खिलाड़ी हैं। इसके अलावा उन्हें इस साल देश के चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मश्री से भी नवाजा गया।
साइना नेहवाल
बैडमिंटन को देश में लोकप्रिय बनाने वाली साइना नेहवाल के लिए यह साल सफलताओं से भरा रहा। पिछले साल वह एक भी खिताब नहीं जीत सकी थी। लेकिन पिछले साल की असफलता को पीछे छोड़ते हुए उन्होंने इस साल 3 बड़े खिताब जीते, जिसमें चाइना ओपन सुपर सीरीज अहम है। साइना ने चाइना ओपन के अलावा इंडियन ओपन ग्रैंड प्रिक्स गोल्ड और ऑस्ट्रेलियन ओपन सुपर सीरीज जीता। इसके अलावा वह उबेर कप में कांस्य पदक जीतने वाली टीम का हिस्सा भी रहीं।
साथ ही वह लंबे समय बाद फिर से रैंकिंग में ऊपर चढ़ रही हैं। वह रैंकिंग में चौथे पायदान पर पहुंच गई हैं। हालां‌कि उनकी सर्वश्रेष्ठ रैंकिंग 2 है जो उन्होंने दो बार 2 दिसंबर 2010 और 20 जुलाई 2013 को हासिल की थी। साइना ने अपने करियर को और बेहतर करने के लिए पुलेला गोपीचंद का साथ छोड़कर विमल कुमार को अपना नया कोच नियुक्त कर लिया। विमल भी देश के जाने-माने बैडमिंटन खिलाड़ी रहे हैं
भारत में साइना नेहवाल के बाद पीवी सिंधू बैडमिंटन में सफल खिलाड़ियों में दूसरा बड़ा नाम है। जो काम साइना नहीं कर सकीं वो सिंधू ने कर दिखाया। पिछले साल की तरह इस बार भी उन्होंने वर्ल्ड बैडमिंटन चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता। 2013 में भी इस टूर्नामेंट में कांस्य पदक हासिल किया था। वह वर्ल्ड चैंपियनशिप में दो पदक जीतने वाली भारत की पहली और एकमात्र बैडमिंटन खिलाड़ी हैं।
इसके अलावा 3 अन्य बड़े स्पर्धाओं में भी कांस्य जीता। उबेर कप में भारत की महिला टीम ने कांस्य पदक जीता जिसमें सिंधू शामिल थी। साथ ही इसी साल इंचियोन में हुए एशियाई खेलों में उन्होंने टीम स्पर्धा में कांस्य पदक देश को दिलाया।
ग्लासगो में खेले गए राष्ट्रमंडल खेलों में भी सिंधू ने महिलाओं की एकल स्पर्धा में कांस्य पदक जीता। उनकी सफलता के शानदार ट्रैक पर एक यही कमी है कि हर बार उनके खाते में कांस्य पदक ही आया है। साल के अंत में सिंधू ने मकाऊ ओपन में खिताबी जीत हासिल की। उन्‍होंने लगातार दूसरी बार मकाऊ ओपन जीता है। हैदराबाद की 19 साल की इस बेहतरीन खिलाड़ी को एनडीटीवी ने स्पोटर्स पसर्न ऑफ द इयर के खिताब से भी नवाजा है।।
एल सरिता देवी
महिला मुक्केबाल एल सरिता देवी के खाते में भले ही कई बड़े खिताब न हों लेकिन उन्होंने इस साल दक्षिण कोरिया के इंचियोन में खेले गए एशियाई खेलों में जो साहस दिखाया उसके लिए उन्हें लंबे समय तक याद किया जाएगा।
लाइटवेट भार वर्ग में सेमीफाइनल मुकाबले में उन्हें मेजबान कोरियाई प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ हारा हुआ घो‌षित कर दिया गया तो वह इस फैसले से चौंक गई और रोने लगीं। भारतीय टीम ने इस फैसले के खिलाफ अपील भी की लेकिन एआईबीए की तकनीकी टीम ने इसे रद्द कर दिया। बाद में उन्होंने विरोधस्वरूप पदक पहनने से इनकार कर दिया। उन्होंने वह पदक रजत पदक विजेता जिससे हारी थी उसे सौंप दिया। उनके इनकार के बाद मामला और गरमा गया।

हालांकि बाद में भारी दबाव के बीच उन्होंने माफी मांगते हुए पदक को स्वीकार कर लिया। वहीं एआईबीए ने उन पर अस्थाई प्रतिबंध लगा रखा है। उनको प्रतिबंधित किए जाने का भारतीय खेल मंत्री के अलावा सचिन तेंदुलकर और विराट कोहली जैसे लोग भी विरोध कर चुके हैं।
कबड्डी
अंतरराष्ट्रीय कबड्डी में भारत का दमखम अभी भी बना हुआ है। एशियाई खेलों में जब से कबड्डी को शामिल किया गया है तब से भारत ने गोल्ड ही गोल्ड जीते हैं।
कबड्डी में पुरुष वर्ग को 1990 से ही शामिल किया गया और भारतीय टीम तब से चैंपियन हैं। जहां तक महिला कबड्डी का सवाल है तो उसे 2010 में पहली बार एशियाई खेलों का हिस्सा बनाया गया।
ग्वांझू (चीन) के बाद 2014 में इंचियोन एशियाड भी भारत की महिला टीम ने देश को पीला तमगा दिलाया। फाइनल में उसने इरान को 30-21 से हराया।
'मिलेनियम चाइल्ड' सीमा अंतिल
हरियाणा के सोनिपत में जन्मी और 'मिलेनियम चाइल्ड' कही जाने वाली सीमा अंतिल ने कम उम्र से ही देश के लिए पदक जीतने का काम शुरू कर दिया था। 17 साल की उम्र में उन्होंने 2000 में जूनियर चैंपियनशिप में देश को स्वर्ण पदक दिलाया था। बाद में डोपिंग में फंसी लेकिन अब वह उस बुरे दौर से बाहर निकल चुकी हैं और उन्होंने साल 2014 में देश के लिए स्वर्णिम प्रदर्शन भी किया है।
सीमा अंतिल अब सीमा अंतिल पुनिया हो गई हैं क्योंकि उनकी शादी उत्तर प्रदेश के मेरठ में हुई है। सीमा के लिए भी यह साल बेहद शानदार रहा। उन्होंने डिस्कस थ्रो में ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में देश के लिए रजत पदक जीता। इसके बाद उन्होंने अपने प्रदर्शन में और सुधार करते हुए इंचियोन एशियाड इसी स्पर्धा में स्वर्ण पदक पर कब्जा जमा लिया।
एथलेटिक्स में दोनों स्वर्ण महिलाओं ने दिलाए। सीमा के अलावा महिलाओं की चार गुना चार सौ मीटर रेस में प्रियंका पवार, टिंटू लुका, मंदीप कौर और पूवम्‍मा माचेटीरा ने शानदार खेल दिखाते हुए देश को पीला तमगा दिलाया।
भारतीय महिला निशानेबाज
भारतीय निशानेबाजों ने 2014 के राष्ट्रमंडल खेलों में शानदार प्रदर्शन किया। महिलाओं ने भी देश को कई पदक दिलाए। निशानेबाज अपूर्वी चंदीला ने महिलाओं की 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा में जोरदार मुकाबले में स्वर्ण पदक जीता। उनकी यह जीत इस लिहाज से बेहद खास रही क्योंकि उनका यह पहला अंतरराष्ट्रीय पदक भी है।
17वें नंबर की निशानेबाज ने वर्ल्ड नंबर 8 की खिलाड़ी को हराया। क्वालीफिकेशन राउंड में अपूर्वा ने गेम्स रिकॉर्ड के साथ फाइनल में जगह बनाई थी। उनके अलावा राही सरनोबत ने 25 मीटर पीस्टल शूटिंग में देश को पीला तमगा दिलाया। 23 साल की यह निशानेबाज सेमीफाइनल में 16 अंकों के बड़े अंतर के साथ फाइनल में पहुंची थी। हालांकि उनका यह प्रदर्शन एशियाई खेलों में नहीं दिखा और एक भी पदक नहीं जीत सकी।
दीपा कर्माकर
दीपा कर्माकर जिम्नास्टिक में तेजी से उभरता नाम है। उन्होंने इस साल ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में जबर्दस्त खेल दिखाया और भारत को महिला वर्ग में पहली बार इस खेल से कोई पदक दिलाया।
दीपा ने ऐतिहासिक प्रदर्शन किया और इस खेल में भारत का लगातार दूसरी बार खाता जारी रखा। पिछली बार आशीष ने भारत का खाता खोला था तो इस बाद दीपा ने। त्रिपुरा की दीपा ने राष्ट्रमंडल खेलों में महिलाओं की वोल्ट स्पर्धा में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया। दीपा को राष्ट्रमंडल में पदक जीतने वाली देश की पहली भारतीय महिला जिम्नास्ट बनने का गौरव हासिल हुआ।  20 वर्षीय दीपा महिलाओं की व्यक्तिगत वॉल्ट स्पर्धा में 14.366 के स्कोर के साथ तीसरे स्‍थान पर रहकर देश का इस खेल में पदकों का खाता खोला। हालांकि उन्होंने टीम स्पर्धा में भी शानदार प्रदर्शन किया लेकिन भारतीय टीम पदक से चूक गईं।
कुश्ती
कुश्ती में भारत के लिए यह साल अच्छा रहा खासकर महिला पहलवानों की लिहाज से। राष्ट्रमंडल खेलों में महिला पहलवानों ने 2 गोल्ड के अलावा 3 सिल्वर और एक कांस्य पदक जीता। जबकि एशियाई खेलों में महिला पहलवानों ने 2 कांस्य पदक जीते।

48 किग्रा फ्रीस्टाइल भार वर्ग में वीनेश फोगाट ने राष्ट्रमंडल में स्वर्ण पदक जीता वहीं एशियाई खेलों में वह देश को कांस्य पदक ही दिला सकी। वीनेश के बाद गीतिका जाखड़ (63 क्रिग्रा) ही ऐसी दूसरी भारतीय महिला पहलवान हैं जिन्होंने इस साल हुए दोनों बड़े खेल आयोजनों में पदक जीते हैं। राष्ट्रमंडल में गीतिका ने रजत तो एशियाई खेलों में कांस्य पदक हासिल किया। बबीता कुमारी ने 55 किग्रा वर्ग में राष्ट्रमंडल खेलों में गोल्ड जीता
विश्व क्रिकेट के लिये दुःख दायी रहा वर्ष 2014, ह्यूज की मौत से सदमें में रहा क्रिकेट जगत

विश्व क्रिकेट के लिये वर्ष 2014 कुछ दुखदायी रहा। ऑस्ट्रेलिया के बल्लेबाज फिलिप ह्यूज की मौत के दुख का सामना करना पड़ा जो घरेलू क्रिकेट मैच के दौरान बाउंसर लगने से चोटिल हो गये और बाद में अस्पताल में उनकी मौत हो गयी। दक्षिण अफ्रीका के महान ऑलराउंडर जैकस कालिस ने अंतरराष्ट्रीय क्रिेकेट से सभी फॉर्मेट से संन्यास लिया। वैसे उन्होंने टेस्ट क्रिकेट से रिटायरमेंट 2013 में ही ले लिया था। एकदिवसीय में 328 मैचों में दक्षिण अफ्रीका का प्रतिनिधित्व करते हुए कालिस ने 11579 रन बनाए. उन्होंने 17 शतक और 86 अर्धशतक भी जड़े।

करीब 18 साल तक अपने देश का प्रतिनिधित्व करने के बाद श्रीलंकाई बल्लेबाज महेला जयवर्धने ने टेस्ट क्रिकेट से संन्यास ले लिया। उन्होंने श्रीलंका के लिए 149 मैच खेले जिसमें 49.84 की औसत से 11814 रन बनाए। इसमें 34 शतक और 50 अर्धशतक भी शामिल हैं।दक्षिण अफ्रीकी क्रिकेट टीम को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाले कप्तान ग्रीम स्मिथ ने अतंरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह दिया। उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ अपना आखिरी टेस्ट मैच खेला. उन्होंने दक्षिण अफ्रीका का प्रतिनिधित्व 117 मैचों में किया। टेस्ट की 205 पारियों में उन्होंने 59.67 की औसत से 9265 रन बनाए. इसमें 27 शतक और 38 अर्धशतक शामिल हैं।
इंग्लैंड बल्लेबाज केविन पीटरसन का क्रिकेट करियर इसी साल फरवरी में खत्म हो गया। ऑस्ट्रेलिया के हाथों एशेज में इंग्लैंड की 0-5 से हार के बाद इंग्लैंड और वेल्स क्रिकेट बोर्ड ने उनका अनुबंध खत्म कर दिया। इस साल के अंत में पीटरसन ने अपनी आत्मकथा रिलीज की। अपनी किताब में पीटरसन ने पूर्व कोच फ्लावर और कुछ सीनियर खिलाड़ियों पर ड्रेसिंग रूम में 'बुलीइंग कल्चर' को हवा देने का आरोप लगाया। उन्होंने साथी खिलाड़ी मैट प्रायर को ड्रेसिंग रूम का 'माहौल खराब करने वाला' और पूर्व कोच एंडी फ्लावर को 'डर-डरकर फैसले लेने वाला' बताया।
ऑस्ट्रेलिया ने जनवरी महीने में इंग्लैंड को सिडनी में खेले पांचवें और अंतिम टेस्ट में 281 रन की करारी शिकस्त देकर मेहमान टीम पर एशेज क्रिकेट सीरीज में 5-0 से क्लीन स्वीप किया। इंग्लैंड एवं वेल्स क्रिकेट बोर्ड (ईसीबी) ने ऑस्ट्रेलिया के हाथों एशेज में मिली करारी हार के बाद टीम के मुख्य कोच एंडी फ्लावर से उनके पद से हटा दिया।

संदिग्ध गेंदबाजी एक्शन के लिए अजमल पर लगा प्रतिबंध, सुनील नरेन की शिकायत
पाकिस्तान के ऑफ स्पिन गेंदबाज सईद अजमल के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में गेंदबाजी करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। दरअसल, उनके गेंदबाजी एक्शन को जांच में अवैध पाया गया। आईसीसी द्वारा जारी विज्ञप्ति में बताया गया कि जांच में सभी गेंदों में उनकी कोहनी तय मानक 15 डिग्री से अधिक घूम रही थी।
जादुई स्पिनर सुनील नरेन को चैंपियंस लीग टी-20 के फाइनल में गेंदबाजी से बैन करने के बाद वेस्टइंडीज ने उनका नाम भारत दौरे से वापस ले लिया है। चैंपियंस लीग के आयोजकों ने इस 26 वर्षीय ऑफ ब्रेक गेंदबाज के संदिग्ध गेंदबाजी ऐक्शन के लिए दो बार रिपोर्ट की थी।

श्रीलंका ने जीता एशिया कप
श्रीलंका ने पाकिस्तान को हराकर एशिया कप क्रिकेट टूर्नामेंट जीत लिया। बांग्लादेश के मीरपुर में पाकिस्तान ने श्रीलंका के सामने जीत के लिए 261 रनों का लक्ष्य रखा था जिसे उसने 47वें ओवर में पांच विकेट के नुकसान पर हासिल कर लिया।

श्रीलंका बना वर्ल्ड टी20 चैंपियन
2014 वर्ल्ड टी-20 फाइनल में श्रीलंका ने भारत को 6 विकेट से हराकर खेल के इस सुपरफास्ट फॉर्मेट का विश्वचैंपियन बन गया। जीत के लिए 131 रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए श्रीलंका ने 13 गेंद शेष रहते ये जीत हासिल की।

अन्य समाचार

अपनी धीमी बल्लेबाजी के कारण आलोचकों के निशाने पर रहे पाकिस्तान के कप्तान मिसबाह उल हक ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ केवल 56 गेंद पर शतक ठोककर टेस्ट क्रिकेट में सबसे तेज शतक के विव रिचर्ड्स के रिकॉर्ड की बराबरी की। न्यूजीलैंड के हरफनमौला खिलाड़ी कोरी एंडरसन ने वेस्टइंडीज के खिलाफ 36 गेंदों में शतक जमाकर नया विश्व रिकॉर्ड बनाया। एंडरसन ने अपनी पारी की 36वीं गेंद पर 12वां छक्का जमाकर पाकिस्तानी बल्लेबाज शाहिद अफरीदी का 18 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया। अफरीदी ने 1996 में श्रीलंका के खिलाफ 37 गेंदों में शतक जमाया था।






Wednesday, April 10, 2013

क्रिकेट का एक ही “वाल” राहुल द्रविड


भारतीय क्रिकेट के महानतम बल्लेबाजों में शुमार तथा द वाल”  के नाम से मशहूर राहुल द्रविड़ ने अपने कॅरियर में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं पर कभी भी उन्होंने मीडिया में खुलेआम अपने गुस्सा नहीं दिखाया इसकी बजाय उन्होंने अपने प्रदर्शन से अपनी काबिलियत साबित की है।
वर्तमान परिदृश्य में राहुल अपनी योग्यता के बल पर अपने समकालिन क्रिकेटरों से कहीं ज्यादा आगे हैं। इसका ताजा उदाहरण आईपीएल-6 है, जहां सचिन, रिकी पोटिंग, माहेला जयवर्धने, जैक्स कैलिस जैसे खिलाडी खेल रहे हैं, लेकिन राहुल न सिर्फ इन खिलाडियों से ज्यादा अच्छा खेल दिखा रहे हैं, बल्कि अपनी टीम राजस्थान रायल के कोच की भी भूमिका निभा रहें हैं।

यहां तक की एक मैच में तो राहुल ने मैन आफ दी मैच का पुरस्कार भी जीता। राहुल पहले मैच में  दिल्ली डेयरडेविल्स के खिलाफ तीसरे नंबर पर बल्लेबाजी करने उतरे और 51 गेंदों पर 65 रनों की आतिशी पारी खेलकर साबित कर दिया कि अच्छी तकनीक फटाफट क्रिकेट में भी काम आती है। द्रविड की गिनती चौके-छक्के लगाने वाले खिलाड़ियों में नहीं होती, उम्र भी उनकी 40 साल से ज्यादा हो चुकी है, लेकिन उनकी बल्लेबाजी को देखकर एक बार भी ऐसा नहीं लगा कि वे ट्वेंटी-20 क्रिकेट में मिसफिट हैं।

अपने एक दिवसीय करियर के शुरूआत में संघर्ष करने के बाद द्रविड़ ने लगन और मेहनत से खुद को बेहतर बनाया है। बहुत कम लोगों को यह याद होगा कि एकदिवसीय में द्रविड़ 22 गेंदों में 50 रन बनाने का करिश्मा दिखा चुके हैं। यह स्कोर उन्होंने न्यूजीलैंड के खिलाफ 2003 में बनाया था। यहीं नहीं द्रविड़ ने टी20 इंटरनेशनल में 2011 में डेब्यू मैच में ही एक के बाद एक तीन छक्के लगाए थे।

आईपीएल में द्रविड़ का योगदान देखें तो एक पारी बेहद सराहनीय है। रॉयल चैलेंजर्स बेंगलूरू के खिलाफ आईपीएल के पहले ही सीजन में द्रविड़ ने 36 गेंदों में छह छक्कों की मदद से 75 रन बनाए थे। हाल ही दिल्ली डेयरडेविल्स के खिलाफ हुए मैच में क्लासी द्रविड़ देखने को मिले।

जब उन्होंने पहली बॉल पर चौका लगाया तो सबको समझ आ गया कि आज द्रविड़ कुछ अलग करेंगे। वही हुआ, अगले कुछ शॉर्ट में द्रविड़ ने अपनी टेक्निकल ब्रिलिएंस का प्रदर्शन किया। जैसे जैसे खेल आगे बढ़ा द्रविड़ को फ्रंट-लेग टाइम क्लियर कर अपने लिए रूम बनाते देख गया।
आईपीएल में द्रविड़ की स्ट्राइक रेट 117.24 है, यह किसी भी बल्लेबाज के लिए टी20 में हाइएस्ट स्ट्राइक रेट 120 से थोड़ा ही कम है। इसके अलावा आईपीएल 6 के पहले मैच के दौरान उन्हें मैदान पर काफी मुस्कुराते हुए देखा गया।

 वह बेहद संजीदा और गंभीर खिलाड़ी हैं और टीम इंडिया में खेलते वक्त भी उन्हें बहुत कम ही मैदान पर हंसते हुए देखा जाता था। पर यहां उनकी मुस्कान यह संकेत दे रही थी कि वे टी20 फॉर्मेट में कम प्रेशर महसूस करते हैं।

सचिन, सौरभ और लक्ष्मण के साथ खेलते हुए राहुल ने अपनी एक अलग ही जगह बनाई है। कई लोग उन्हें एक शांत बल्लेबाज मानते हैं। शुरू में उनकी धीमी बल्लेबाजी की वजह से उन्हें एकदिवसीय मैचों में अधिक मौके नहीं दिए गए पर राहुल द्रविड़ ने एकदिवसीय मैचों में भी ऐसी छाप छोड़ी की दुनिया उनकी कद्रदान हो गई।

साल 1999 और 2003 के विश्व कप में राहुल द्रविड़ ने जो भूमिका निभाई उससे साफ हो गया कि इस दीवार में बहुत जान है। द्रविड़ ने अब तक 153 टेस्ट मैचों की 265 पारियों में 52.40 की औसत से 12314 रन बनाए हैं. इस दौरान उन्होंने 60 अर्धशतक और 32 शतक जमाए हैं।

टेस्ट के विपरीत उन्होंने वनडे में धीमे अंदाज में बल्लेबाजी की है पर वनडे में भी राहुल द्रविड़ का सफर शानदार रहा है। 39.43 की औसत से राहुल द्रविड़ ने 339 मैचों में 10,000 रन बनाए हैं। विश्व क्रिकेट में दस हजार का आकंडा पार करने वाले वह दुनियां के छठे बल्लेबाज हैं। टेस्ट मैचों में 200 से अधिक कैच लेकर वह दुनियां के सबसे अधिक कैच लेने वाले खिलाड़ी भी हैं।

राहुल द्रविड़ ने हमेशा मुसीबत के समय टीम की हर तरह से मदद की है। जब टीम को एक विकेट कीपर की जरुरत थी तो राहुल द्रविड़ ने यह भूमिका भी निभाई. जब जरुरत एक कप्तान की थी तब उन्होंने कप्तानी संभाली।

राहुल द्रविड़ को मिले पुरस्कार और रिकॉर्ड

अर्जुन अवार्ड : 1998 में राहुल द्रविड़ को अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया गया था.

2000: विजडन क़्रिकेटर ऑफ द ईयर (Wisden Cricketer of the Year 2000)

पद्म श्री : 2004 में राहुल को पद्म श्री से सम्मानित किया गया था.

आईसीसी प्लेयर ऑफ द ईयर : 2004 में ही राहुल द्रविड़ को आईसीसी प्लेयर ऑफ द ईयर के खिताब से नवाजा गया था.
पद्मभूषण  :   खेल में अहम योगदान के लिए राहुल द्रविड़ को 2013 में पद्मभूषण सम्मान दिया गया है. टीम इंडिया की दीवार माने जानेवाले राहुल द्रविड़ ने क्रिकेट में अपना अहम योगदान दिया है.
सर्वाधिक कैच : टेस्ट इतिहास में राहुल द्रविड़ सबसे अधिक कैच लेने वाले खिलाड़ी हैं जिनके नाम 200 कैच हैं.

12,000 टेस्ट रन : राहुल द्रविड़ दुनियां के तीसरे और भारत के दूसरे ऐसे बल्लेबाज हैं जिनके नाम 12,000 टेस्ट रन हैं.

10,000 वनडे रन : राहुल द्रविड़ भारत के तीसरे ऐसे बल्लेबाज हैं जिनके नाम 10,000 से ज्यादा वनडे रन हैं.

85 शतकीय भागीदारी : राहुल द्रविड़ ने अपने अन्य साथी क्रिकेटरों के साथ 85 से अधिक शतकीय भागीदारियां निभाई हैं जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है.

300 रन से ज्यादा की भागीदारी : राहुल द्रविड़ वनडे के ऐसे इकलौते खिलाड़ी हैं जिन्होंने एक पारी में 300 से ज्यादा रनों की भागीदारी में हिस्सा लिया है.
सुनील

Tuesday, April 9, 2013

इरादों में हो मजबूती तो कोई मंजिल नहीं मुश्किल


इंसान में जज्बा और जुनून हो तो वह कमियों के बावजूद अपनी मंजिल को पा ही लेता है फिर चाहे शरीर साथ दे या ना दे। ऐसे में व्यक्ति अपने हौसलों को ही अपने पंख के तौर पर इस्तेमाल कर अपनी उड़ान को पूरा करने की क्षमता रखता है। बात जब खेल की हो तो बात ही कुछ और है।

खेल चाहे जो भी हो पर एक बात तो साफ है कि पैसे और शोहरत की कमी इसमें नहीं है। तभी तो बहुतेरे लोग इसे अपना प्रोफेशन बनाने में लगे हैं। इसमें शारीरिक सक्षम लोगों को तो लम्बी फौज है, पर एक वर्ग ऐसा भी है जो खेल को केवल जुनून और जीवन की कठिनाईयों से न हारने की जिद के आधार पर इसे अपना रहा है। इस वर्ग का विशेषण यह है कि शरीर के साथ नहीं देने के बावजूद उनका जज्बा ही उन्हें लगातार आगे बढ़ने का हौसला देते हैं। इन्हीं हौसलों के जरिए ही आज दुनिया भर में कई ऐसे खेल अस्तीत्व में आ गये हैं जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। और बात जब महिलाओं की हो तो वह अपने-आप में ही खास हो जाता है।

"कमल है कमजोर नहीं, शक्ति का नाम नारी है"- इस पंक्ति को चरितार्थ किया है मूल रुप से मेरठ की रहने वाली व बीएचयू के दृश्य संकाय कला की छात्रा सुहानी विथिका ने। सुहानी ने दिखा दिखा दिया कि अगर हौसला हो तो इंसान अपनी पहुँच से ऊपर तक मेहनत कर जो सपने देखे हैं, वास्तविकता में उसे परिणीत भी कर लेते हैं।

कहते हैं कि इंसान यदि ठान ले तो वह कुछ भी कर सकता है, यहां तक कि असंभव को भी संभव कर सकता है। यही बात सुहानी पर भी लागू होती है। मूक बधिर सुहानी की ढेरों उपलब्धियां उसकी जन्मजात कमी को कहीं पीछे छोड चुकी है। हालांकि सुहानी की राष्ट्रीय स्तर पर पाई गई उपलब्धियों का रास्ता उन कांटों भरे रास्तों से गुजरी है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। बहरहाल उत्तरप्रदेश की इस होनहार वीरवान खिलाडी की नजर बुल्गारिया मे होने वाली डीफ ओलंपिक के बैडमिंटन प्रतियोगिता में लगी है। जिसकी तैयारी में वह जुट चुकी है।

अपने दृढ़ निश्चय के बल पर शारीरिक अक्षमता को मात देते हुए सुहानी ने अपनी अलग पहचान बना ली है। सुहानी विथिका ने औरंगाबाद में 1 अप्रैल से 5 अप्रैल तक चले नेशनल गेम्स आफ डिफ-2013 के बैडमिंटन प्रतियोगिता में अपने बढि़या खेल से न सिर्फ बनारस बल्कि अपने माता-पिता का भी सम्मान बढाया है।

विथिका ने अपनी मां की मदद से बताया कि उसने बैडमिंटन एकल प्रतियोगिता में शानदार प्रदर्शन करते हुए कांस्य पदक हासिल किया, जबकि मिश्रित युगल प्रतियोगिता में सुहानी व उसकी जोडीदार ने स्वर्ण पदक प्राप्त किया।

सुहानी की सफलता से खुश सुहानी की मां रश्मि लाल ने बताया कि अपने बच्ची की ऐसी हालत पर थोडी परेशानी तो जरूर हुई लेकिन उन्होंने अपने बच्ची को इस कमी से लडने का जज्बा दिया। जब सुहानी डेढ साल की हुई तब उन्हें पता चला की वो सुन नहीं सकती और जब 5 साल की हुई तो उसके न बोल पाने के बारे में जानकर एक बार तो ऐसा लगा जैसे उनकी जिन्दगी ही खत्म हो गयी, लेकिन उस समय सुहानी के पिता कर्नल श्यामलाल ने हार नहीं मानी और सुहानी का इलाज कराया हालांकि इलाज के बाद सुहानी ने सुनना तो शुरु कर दिया लेकिन वह बोल नहीं पायी।

उन्होंने बताया की सुहानी ने भी कभी हार नहीं मानी और अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बना ली। अच्छी बैडमिंडन खिलाडी होने के अलावा सुहानी आज लगभग हर खेल में माहिर है। यही नहीं वह एक अच्छी चित्रकार भी है। शटलर होने के अलावा सुहानी स्विमिंग पुल में भी किसी से पीछे नहीं है।

दूसरी तरफ बीएचयू में प्रो. आरएन मिश्रा ने बताया कि सुहानी के बढि़या प्रदर्शन से औरों को भी प्रेरणा मिल रही है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय स्तर पर सुहानी को हर सम्भव मदद की जायेगी।
सुनील दूबे



Monday, March 25, 2013

सचिन के टेस्ट क्रिकेट से सन्यास लेने से खत्म होगा क्रिकेट का आकर्षण



सभी के मन में बस एक ही सवाल है कि लगातार फ्लॉप होने के बावजूद सचिन तेंदुलकर क्रिकेट से सन्यास क्यों नहीं ले रहे? लेकिन सचिन के अब तक के खेल को देखकर हर क्रिकेट प्रेमी यही चाहता है कि सचिन अभी और खेलें क्योंकि सचिन तेंदुलकर भले ही अच्‍छा प्रदर्शन न कर पा रहे हो लेकिन उन्‍हें अब भी टेस्‍ट क्रिकेट खेलते रहना चाहिए क्‍योंकि वह टेस्‍ट का एक मुख्‍य आकर्षण हैं अगर वह टेस्‍ट से भी सन्‍यास ले लेते हैं तो टे‍स्‍ट क्रिकेट खत्‍म हो जाएगा। सच तो यह है कि सचिन टेस्‍ट के लिए ही बने हैं। उनकी फिटनेस आज भी भारत के कई युवा खिलाडि़यों से बेहतर है।

सचिन के आलोचकों का कहना है कि सचिन अपने एड प्रेम के कारण क्रिकेट को मोह नहीं त्याग पा रहे हैं, हालांकि उनके आलोचकों को एक बात जरुर ध्यान रखना चाहिए कि ये वही सचिन हैं, जिनके बल्ले के खौफ ने दुनिया के सभी गेंदबाजों को रुलाया है।
उनके प्रशंसकों का मानना है कि सचिन के टेस्ट क्रिकेट से सन्यास के बाद क्रिकेट बहुत कुछ खो देगा क्योंकि यह दिग्गज भारतीय बल्लेबाज खेल के लिए "माराडोना और पेले को एक साथ रखने" के बराबर है।
सचिन ने अपने अब तक के कैरियर में रिकार्डो का जो पहाड़ मैदान में खड़ा किया है उसे शायद ही आने वाले दिनों में कोई छू पाए । सचिन के नाम वन डे , टेस्ट मैचो में सबसे अधिक मैच , सबसे अधिक रन , शतक, अर्धशतक बनाने का रिकॉर्ड जहाँ दर्ज  है वहीँ सबसे अधिक मैन आफ द मैच से लेकर  मैन आफ द सीरीज जीतने तक के रिकॉर्ड दर्ज हैं। तभी सर डॉन ब्रेडमैन ने एक दौर में सचिन में अपना अक्स देखा था और शेन वार्न  सरीखे कलाई के जादूगर की रातो की नीद को उड़ा डाला था।

सचिन के नाम अन्तर्राष्ट्रीय  क्रिकेट में 100 शतको का रिकॉर्ड दर्ज है । फ़रवरी 2010 में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ वन डे में  दोहरा शतक लगाने  वाले पहले खिलाडी बनने के साथ ही गेदबाजी में अपना कमाल 154 विकेट लेकर दिखाया । साझेदारी बनाने से लेकर साझेदारी तोड़ने तक में सचिन का कोई सानी नहीं  था । दो बार उन्होंने वन डे मैचो में एक साथ 5 विकेट झटकने के साथ ही सर्वाधिक 62  बार मैन आफ द मैच से लेकर 15 बार मैन आफ द सीरीज का रिकॉर्ड अपने नाम किया।  वाल्श से लेकर डोनाल्ड , अकरम से लेकर वकार , शोएब अख्तर से लेकर ब्रेट ली और फिर शेन वार्न  से लेकर  मुरलीधरन सबकी गेदबाजी से सामने सचिन ऐसे चट्टान की  भांति डटे  रहते थे, जिनका विकेट हर किसी के लिए अहम हो जाता था।
15 नवम्बर 1989 को पाकिस्तान के विरुद्ध  महज 16 साल की उम्र में घुंघराले बाल वाले इस युवा खिलाडी ने जब  अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण किया था को किसी ने अंदाजा नहीं लगाया था कि भविष्य में यह खिलाडी  क्रिकेट के  देवता के देवता के रूप में पूजा जायेगा लेकिन सचिन ने अपनी प्रतिभा 1988 में ही दिखा दी जब अपने बाल सखा  विनोद काम्बली के साथ  664 रन की रिकॉर्ड साझेदारी कर इतिहास रच  डाला  था । पाकिस्तान के दौरे में अब्दुल कादिर की गुगली पर उपर से छक्का जड़कर उन्होंने अपने इरादे  जता  दिए थे । यही नहीं उस दौर को अगर याद  करें तो सियालकोट के टेस्ट में एक बाउंसर सचिन की नाक में जाकर लग गया । नाक से खून बह रहा था लेकिन इन सबके बीच सचिन मैदान से बाहर नहीं गए और डटकर गैदबाजो  का सामना किया ।

1990 में इंग्लैंड का ओल्ड ट्रेफर्ड सचिन का पहले शतक का गवाह बना जब उन्होंने विदेशी धरती से अपनी अलग पहचान बनाने में सफलता पायी । इसके बाद सिडनी और पर्थ की खतरनाक समझी जाने वाली पिचों पर सचिन ने अपनी शतकीय पारियों से प्रशंसको का दिल जीत लिया । इसके बाद तो उनके नाम के साथ हर दिन नए रिकॉर्ड जुड़ते गए । आज सचिन की इन उपलब्धियों के पहाड़ पर कोई खिलाडी दूर दूर तक उनके पास  तक नहीं फटकता ।  सचिन में एक खास तरह की विशेषता भी है जो उनको अन्य  खिलाडियों से महान बनाती है । उनका क्रिकेट के प्रति जज्बा देखते ही बनता है और पूरे करियर के दौरान उन्होंने इसे जिया । शालीन और शांतप्रिय होने के अलावे धैर्य और अनुशासन उनमे ऐसा गुण था कि विषम परिस्थितियों में में सचिन अपना रास्ता खुद से तय करते थे । कभी शून्य पर भी आउट हो जाते तो आलोचकों को करारा  जवाब अपने खेल से ही देते । टीम इंडिया में एक मार्गदर्शक के तौर पर उन्होंने युवाओ को एक नया प्लेटफार्म दिया जहाँ उनसे सलाह मांगने वालो में खुद धोनी , युवराज , भज्जी सरीखे खिलाडी शामिल रहते थे । प्रत्येक खिलाडी उनसे कुछ नया सीखने की कोशिश में रहता । यह हमारे लिए फक्र की बात है सचिन को हमने उनके शुरुवाती  दौर से खेलते हुए देखा है । आने वाले भावी पीढियों  को  हम सचिन की गौरव गाथा बड़े गर्व के साथ सुना पाएंगे ।

सचिन के लिए वर्ल्ड कप एक सपना था और धोनी की अगुवाई वाली टीम का हिस्सा बनने पर उन्हें काफी नाज है । इसकी झलक  वन डे सन्यास के समय उनके द्वारा दिए बयानों में साफ झलकी जहाँ उन्होंने टीम के वर्ल्ड कप जीतने पर  ख़ुशी जताई और अगले वर्ल्ड कप के लिए अभी से एकजुट हो जाने की बात कही । सचिन जैसे कोहिनूर अब भारत को शायद ही मिलें क्युकि  सचिन जैसे समर्पण की बात आज के खिलाडियों में नदारद है । क्रिकेट आज एक मंडी  में तब्दील हो चुका  है जहाँ खिलाडियों की करोडो में बोलियाँ लग रही हैं । सारी  व्यवस्था मुनाफे पर जा टिकी है जहाँ खेल का पेशेवराना पुराना अंदाज गायब है जो अस्सी और नब्बे के दशक में देखने को मिलता था । आज के युवा खिलाडियों की एक बड़ी जमात ट्वेंटी  ट्वेंटी के जरिये अपनी प्रतिभा को दिखा रही है जबकि वन डे और टेस्ट क्रिकेट से उनका मोहभंग हो गया है । यही नहीं इसमें उनका प्रदर्शन भी फीका ही रहा करता है । ऐसे में बड़ा सवाल यहीं से खड़ा होता है सचिन, गांगुली, राहुल , वी  वी एस  वाली लीक पर कौन आज के दौर में चलेगा वह भी उस दौर में जब ट्वेंटी ट्वेंटी टेस्ट से लेकर वन डे को लगातार निगल रहा है ।

 बहरहाल सचिन ने वन डे से सन्यास के बाद अभी टेस्ट मैच खेलने की बात कही है । यह उनके करोडो चहेते प्रशंसको के लिए राहत की खबर है लेकिन उनके वन डे से अचानक लिए गए सन्यास पर  सस्पेन्स अब भी बना है । आगे भी शायद यह बना रहे क्युकि मैदान से अन्दर और बाहर सचिन जिस शानदार  टाइमिंग से खेलकर कई लोगो को आईना दिखाते थे वैसी टाइमिंग उनके  सन्यास में देखने को नहीं मिली । जाहिर है सचिन पहली बार चयनकर्ताओ  के निशाने पर सीधे तौर पर आये और आखिरकार दबाव  झेलने की वजह से उन्होंने वन डे से अचानक सन्यास की घोषणा कर सभी को चौंका ही  दिया ।  इतना कुछ करने के बावजुद अगर उनकी काबिलियत पर अंगुली उठायी जाती है तो यह उनका अपमान ही है। टेस्ट क्रिकेट से सन्यास की बात उनके उपर ही छोड देना चाहिए, क्योंकि क्रिकेट के इस  शलाका पुरुष के उपर संन्यास के लिए दवाब डालना उनका अपमान करना ही है।

'27 साल' की युवा भारतीय टीम ने 81 साल के टेस्ट इतिहास में फहराया “धोनी झंडा”


ऐतिहासिक फिरोजशाह कोटला के मैदान पर '27 साल' की युवा भारतीय टीम ने भारत के 81 साल के टेस्ट इतिहास में पहली बार आस्ट्रेलिया को हराकर आस्ट्रेलिया के खिलाफ चार मैचों की श्रृंखला में क्लीनस्वीप  किया। कोटला के 65 साल के टेस्ट इतिहास में अनेक बेमिसाल रिकॉर्ड बने हैं। उनमें से कई रिकार्ड अब भी कायम हैं लेकिन जब भी इस मैदान पर कोई नया मैच खेला जाता है तो उनके टूटने की सम्भावना बनी रहती है।

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच 22 मार्च से चौथे टेस्ट मैच के शुरू होते ही भारतीय टीम के इस मैदान पर 26 साल से अजेय रहने के रिकॉर्ड के ध्वस्त होने का फिर से खतरा उत्पन्न हो गया था।
भारतीय टीम पर इसे बचाते हुए ऑस्ट्रेलिया को इस मैदान पर 1959 के बाद पहली जीत हासिल करने से रोकने की चुनौती भी थी। तीन दिनों में जीत हासिल करके महेंद्र सिंह धौनी की टीम ने इस रिकॉर्ड के साथ-साथ दिल्लीवासियों के भरोसे को भी बरकरार रखा है।
बीते 27 साल से कोटला, भारतीय टीम के लिए भाग्यशाली रहा है, क्योंकि इस दौरान यहां खेले गए नौ मैचों में से भारत एक भी हारा नहीं है। कोटला में भारत को अंतिम बार 29 नवम्बर, 1987 में हार मिली थी, जब वेस्टंडीज ने उसे पांच विकेट से हराया था।
उससे पहले के 10 मैच भी भारत के लिए काफी खराब रहे थे। 1972 से लेकर 1987 के बीच भारत को 1972, 1974 और 1976 में क्रमश: इंग्लैंड, वेस्टइंडीज और इंग्लैंड से हार मिली थी।
इसके बाद 1979 से 1983 के बीच पांच मैच बेनतीजा रहे और फिर 1984 में भारत को एक बार फिर इंग्लैंड ने पटखनी दी। वेस्टइंडीज से 1987 में मिली हार से ठीक पहले भारत और ऑस्ट्रेलिया की टीमें इस मैदान पर भिड़ी थीं, जिसका नतीजा नहीं निकल सका था।
वर्ष 1987 में भारत ने वेस्टइंडीज से पटखनी खाने के बाद इस मैदान पर अपनी जीत का अजेय क्रम शुरू किया और उसके बाद कुल 10 मैचों में से नौ में जीत हासिल की। वर्ष 2008 में ऑस्ट्रेलिया के साथ यहां एक बार फिर भिड़ंत हुई थी, जो बेनतीजा रहा था।
इस मैदान पर भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच यह सातवां मैच हुआ, जिसमें से अब तक भारत को तीन मैचों में जीत मिली है जबकि एक में ऑस्ट्रेलिया जीता है। तीन मैच बराबरी पर छूटे हैं। भारत ने 1996 और 1969 में ऑस्ट्रेलिया को हराया था।

Wednesday, March 6, 2013

ये उड़ान पंखों की नहीं हौसलों की है...


जज्बा और जुनून हो तो इंसान लाख कमियों के बावजूद अपनी मंजिल को पा ही लेता है फिर चाहे शरीर साथ दे या ना दे। ऐसे में व्यक्ति अपने हौसलों को ही अपने पंख के तौर पर इस्तेमाल कर अपनी उड़ान को पूरा करने की क्षमता रखता है। चाहे कला के क्षेत्र की बात हो या फिर जीवन यापन के लिए नौकरी करने की। हौंसला हर घड़ी इंसान को अपनी पहुँच से ऊपर तक मेहनत करने को प्रोत्साहित करता है, जो वास्तविकता में कार्य परिणीत भी होती है। ऐसे में जब खेल की बात आती है तो लोग अक्सर सोचने लगते हैं कि शारीरिक अक्षमता के लोग कैसे खुद को पहचान दिया पायेंगे, लेकिन आज खेलों में भी अपने दृढ़ निश्चय के बल पर शारीरिक अक्षमता को मात देते हुए कईयों ने अपनी अलग पहचान बना ली है।
खेल चाहे जो भी हो पर एक बात तो साफ है कि पैसे और शोहरत की कमी इसमें नहीं है। तभी तो बहुतेरे लोग इसे अपना प्रोफेशन बनाने में लगे हैं। इसमें शारीरिक सक्षम लोगों को तो लम्बी फौज है, पर एक वर्ग ऐसा भी है जो खेल को केवल जुनून और जीवन की कठिनाईयों से न हारने की जिद के आधार पर इसे अपना रहा है। इस वर्ग का विशेषण यह है कि शरीर के साथ नहीं देने के बावजूद उनका जज्बा ही उन्हें लगातार आगे बढ़ने का हौसला देते हैं। इन्हीं हौसलों के जरिए ही आज दुनिया भर में कई ऐसे खेल अस्तीत्व में आ गये हैं जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। मसलन जिसके पैर साथ ना देते हो वह व्यक्ति भला कभी बास्केट बाल खेल सकता है, या फिर जिसने दुनिया के विभिन्न रंगों को देखा न हो वह टेनिस के खेल में बेहतरीन शॉट या निशानेबाजी में लक्ष्य पर सटिक निशाना लगा सकता है। ऐसे और कई सवाल हैं जो दिमाग में उलझन पैदा करते हैं लेकिन अब यह सब सच हो गया है। तकनीक के कमाल और खिलाड़ियों के कभी हार न मानने के जज्बे ने सब कुछ कर दिखाया है।

खेल और उसके खिलाड़ी :-
पैरा बैडमिंटन- कहते हैं मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं जिनके सपनों में जान होती है, पंख से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है..। ये पंक्तियां अबोहर के नजदीकी गांव खुइयां सरवर के बैंडमिंटन खिलाड़ी संजीव कुमार पर पूरी फिट बैठती हैं। संजीव ने विकलांगता को मात देते हुए अपनी काबिलियत से यह सिद्ध कर दिया है कि अगर इरादे मजबूत हों तो कुछ भी असंभव नहीं है।

संजीव कुमार ने दूसरी फ्रेंच ओपन इंटरनेशनल पैरा बैडमिंटन (विकलांग) 2012 मुकाबले में कांस्य पदक जीत कर विकलांगता को मात दी है। प्रतियोगिता फ्रांस के रोडीज में 6 से 9 अप्रैल को हुई थी, जिसमें 13 टीमों ने अपने जौहर दिखाए थे। गौरतलब हो कि इससे पहले भी संजीव बैडमिंटन में कई पुरस्कार जीत कर अपना नाम रोशन कर चुका है। प्रतियोगिता में यह खिलाड़ी ट्राईसाइकिल पर बैठकर ही खेलता है।
विकलांगों की कुश्ती डॉगलैग्स:- शरीरिक तौर पर विकलांग होना लोगों को खेलों से दूर नहीं कर सकता। फिर चाहे खेल कुश्ती ही क्यों न हो। जापान का डॉगलैग्स रेस्लिंगग्रुप ऐसी ही एक संस्था है जो अपाहिज लोगों को कुश्ती लड़ने का मौका देती है। फिर भी बहुत से लोग इस लड़ाई को नकली मानते हैं, जबकि अन्य खेलों की तुलना में डॉगलैग्स को ज्यादा मनोरंजक बनाया गया है।
डॉगलैग्स खेल के संस्थापकों में से एक यूकिनोरी किटाजिमा कहते हैं कि दर्शकों का मनोरंजन करने वाला कोई भी शख्स पहलवान बन सकता है। डॉगलैग्स के एक मशहूर पहलवान ईटीका वे उदाहरण देते हैं कि वे किस तरह चेहरे पर भाव भी प्रकट करते हैं। इन शारीरिक अक्षम खिलाड़ियों के नाम भी हार्ड रॉक, नो सिंपैथी और वेलफेयर पॉवर जैसे रोमांचक होते हैं, ताकि कहीं से भी उन्हें यह न लगे की उन्हें केवल सहानुभूति के तौर पर पसंद किया जाता है।

 व्हीलचेयर बास्केटबॉल- इस खेल की कल्पना द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अस्तीत्व में आयी थी। जब युद्ध के विकलांग दिग्गजों द्वारा रचित व्हीलचेयर बास्केटबॉल का खेल शुरु हुआ। इसमें शारीरिक रूप से विकलांग लोगों के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन की गई व्हीलचेयर पर बास्केटबॉल खेला जाता है। दुनिया में व्हीलचेयर बास्केटबॉल का शासी निकाय अंतर्राष्ट्रीय व्हीलचेयर बास्केटबॉल फ़ेडरेशन (आईजब्ल्यूबीएफ) है। अभी तक दुनिया में कोई बड़ा नाम इस खेल के प्रति ज्यादा आकर्षित नहीं हुआ और ना ही इस खेल को कोई पब्लिसिटी मिली है। लेकिन इतना जरुर हुआ है कि इस खेल को पसंद करने वाले खिलाड़ी व्हीलचेयर पर बैठकर ही सही खेल का लुफ्त केवल देखकर नहीं खेल कर भी लेने में सक्षम हो गये हैं।
ब्लाइंड टेनिस- इंसान की कल्पनायें दुनिया की मौजूद वस्तुओं-सुविधाओं से परे चीजे करने को उत्साहित करती है। इसी का नतीजा है कि नेत्रहीन लोगों के लिए ब्लाइंड टेनिसजैसे खेल का आविष्कार हो सका। इस खेल की खोज का श्रेय जापान के मियोशी टाकी को जाता है, जो खुद नेत्रहीन हैं और बचपन से ही टेनिस के प्रति लगाव ने उन्हें आविष्कारक बना दिया।
शुरुआत में उनका एक ही मकसद था, हवा में तैरती बॉल को ज्यादा से ज्यादा ताकत से मारना। काफी प्रैक्टिस के बाद वे इसमें माहिर हो गए। फिर उन्होंने एक अलग तरह की नरम बॉल खोजी। इस बॉल में आवाज भी होती है, जिसकी स्थिति का अंदाज लगाकर नेत्रहीन व्यक्ति उसे शॉट मार सकता है।

मियोशी की मेहनत रंग लाई और 1990 में जापान में पहली नेशनल ब्लाइंड टेनिस चैंपियनशिप आयोजित की गई। आज देश के हर हिस्से में सैकड़ों नेत्रहीन लोग ब्लाइंड टेनिस खेलते हैं। जापान के अलावा ये खेल चीन, कोरिया, ताईवान, ब्रिटेन और अमेरिका में भी पहुंच गया है। भारत मे यह खेल अभी शैशव अवस्था में है और केवल हैदराबाद में एक संस्थान में इसका प्रशिक्षण कार्य होता है।



विकलांग क्रिकेट -  देश में क्रिकेट की लोकप्रियता इतनी है कि बच्चों-बूढ़ों से लेकर शारीरिक अक्षम लोग भी इसके रंग में रंग जाने को तैयार रहते हैं। लोगों का इसके प्रति लगाव ही एकमात्र कारण है कि आज इस खेल का एक अन्य रुप विकलांग क्रिकेट भी सामने आ गया है। ऐसे में पैरालंपिक कमेटी आफ इंडिया कई टूर्नामेंट का आयोजन कर विकलांग खिलाड़ियों को नया मंच देता है।
हाल ही में कर्नाटक में आयोजित गंधर्व ट्राफी 2012 में कई राज्यों के खिलाड़ियों ने अपनी प्रतिभा दिखाई। उन्हीं प्रतिभावान खिलाड़ियों में एक मोहन ठाकुर भी है, जो स्नातक तृतीय वर्ष का विद्यार्थी है। पटना के विकलांग खेल अकादमी का यह हुनरमंद खिलाड़ी शारीरिक अक्षमता के साथ आर्थिक तंगी का भी शिकार है। पर इसने अपने जज्बे और जुनून से साबित कर दिया कि अगर कुछ करने की ठानी जाये तो मंजिल मिल ही जाती है। इस खिलाड़ी ने कर्नाटक के हुबली शहर में राष्ट्रीय स्तर के पैरालंपिक प्रतियोगिता में बिहार टीम की ओर से भाग लिया और आठ राज्यों की टीमों के बीच तीसरा स्थान हासिल किया।
इसके अलावा, पटना में आयोजित बारहवीं बिहार राज्य पारालंपिक एथेलेटिक्स चैंपियनशिप के डिस्कस थ्रो में द्वितीय स्थान भी ग्रहण किया तथा पन्द्रह सौ मीटर दौड़ में तृतीय स्थान भी प्राप्त किया है। अपनी प्रतिभा के बल पर ही मोहन ने राष्ट्रीय स्तर पर परचम लहराया है। अब बस उसे सरकार से आर्थिक मदद की दरकार है जो उसकी मेहनत को और आगे ले जाने में मददगार हो सके।
विकलांग ओलम्पिक खेल- शारीरिक अक्षम लोगों के लिए खेल का परिक्षेत्र यहीं नहीं रुकता बल्कि दिन-प्रतिदिन नयी-नयी कड़ियां जुड़ती जा रही हैं। अब तो ओलम्पिक खेलों में भी विकलांग खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिलने लगा है। इस साल लंदन में होने जा रहे विकलांग ओलम्पिक खेलों में उत्तरी कोरिया का खेलदल भी हिस्सेदारी करेगा। इससे पहले उत्तरी कोरिया ने विकलांग ओलम्पिक खेलों में कभी भाग नहीं लिया था।
लंदन ओलम्पिक कमेटी ने इस बाबत साफ कर दिया है कि उत्तरी कोरिया के विकलांग एथलीटों का एक दल पेइचिंग पहुँच गया है। उत्तरी कोरिया के खिलाड़ियों को यहाँ बने एक शिविर में चीन के विकलांग खिलाड़ियों के साथ ट्रेनिंग दी जाएगी। वे तैराकी, टेबल-टेनिस और एथलेटिक्स खेलों में हिस्सा लेगें। लंदन में 29 अगस्त से 9 सितम्बर तक चलने वाले विकलांग ओलम्पिक खेलों के लिए सात भारतीय खिलाड़ियों ने भी अपनी सीट बुक करा ली है।
लंदन ओलम्पिक की पैरा-ओलम्पिक स्पर्धाओं के लिये क्वालिफाई करने वाले हरियाणा के सात विकलांग खिलाड़ियों ने हर प्रतियोगिता के लिए खुद को तैयार बताया है। उन्होंने कहा कि उनका प्रयास है कि जब वो लंदन तक पहुँचे हैं तो आगे भी जायेंगे। इन सात खिलाड़ियों में अमित सरोहा-डिस्कस थ्रो, ज्ञानेन्द्र सिंह घनघस-लाँग जम्प, जयदीप सिंह-डिस्कस थ्रो, अमित कुमार-लांग जम्प, जगमेन्द्र-डिस्कस थ्रो, नरेन्द्र-जैवलिन थ्रो और विजय कुमार-जैवलिन थ्रो शामिल हैं।

छोटे कस्बों की अन्तरराष्ट्रीय प्रतिभाएं- वर्तमान विकलांग प्रतिभाओं से परे कुछ होनहार ऐसे भी हैं जो भविष्य में देश के मान को बढ़ाने की तैयारियों में जुटे पड़े हैं। इनमें एक हैं खेकड़ा कस्बे के अंकुर, जो नेत्रहीन है पर गजब का एथलीट भी है। अपने देश की प्रतियोगिताओं को छोड़िए उसने अमेरिका में हुई नेत्रहीनों की विश्व युवा खेलकूद प्रतियोगिता में विश्व रिकॉर्ड बनाते हुए दो सोने के पदक जीते हैं। उसका कहना है कि वह नेत्रहीन हुआ तो क्या वह देश का नाम रोशन करना चाहता है और इसके लिए वह मेहनत कर रहा है। बकौल अंकुर, अभी तो मैं सीखने के क्रम में हूँ, पर मेरा ख्वाहिश अपनी सच्ची लगन से देश का गौरव बढ़ाना है।
इसी तरह, बड़ौत नगर की सोनिया पैरों से विकलांग है, लेकिन वह अच्छी निशानेबाज है और आजकल जौहड़ी गांव में भारतीय खेल प्राधिकरण के केंद्र पर प्रशिक्षण ले रही है। उसके पास एयर पिस्टल भी नहीं है लेकिन उधार की पिस्टल से प्रशिक्षण लेकर राज्य स्तरीय प्रतियोगिता तक पहुंच गई है। उसका कहना है कि वह विकलांग है और हथियार भी उसके पास नहीं है लेकिन अपनी मेहनत के बल पर वह विदेशों तक में नाम रोशन करेगी। ऐसे ही खेड़की गांव का रहने वाला आकाश भी विकलांग है। वह शाहमल रायफल क्लब बड़ौत पर निशानेबाजी का अभ्यास करता है। उसने स्टेट व नेशनल स्तर पर आठ पदक जीते हैं। पिछले साल उसका चयन जर्मनी में होने वाले व‌र्ल्ड कप के लिए हो गया था, लेकिन पासपोर्ट न बन पाने के कारण वह वह नहीं जा सका था। अब वह पूना में होने वाली मास्टर मीट शूटिंग चैंपियनशिप में भाग लेने की तैयारी कर रहा है।
कहते हैं कि कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो मंजिलें झुककर सलाम करती है। देश और दुनिया के इन शारीरिक अक्षम इंसानों ने भी अपने जज्बे से अपनी मंजिल को अपने सामने झुका दिया है। बहरहाल, जिस तरह मुफलिसी और मायूसी के अंधेरों से निकलकर इस विकलांग खिलाड़ियों ने अपने हौसलों से खुद का आसमान तैयार किया है। जिस तरह इन खिलाड़ियों ने अपनी गरीबी और अक्षमताओं को पीछे ढ़केल दिया है, वह आने वाली पीढ़ी को अपने जज्बों और हौसलों पर भरोसा करने का पाठ साबित होगा। अब वह दिन दूर नहीं जब आर्थिक और शारीरिक रूप से कमजोर बच्चे समझदार होते ही स्टेडियमों का रुख खुद कर लिया करेंगे। उनके लिए बस एक ही बात मायने रखेगी कि हौसला और हिम्मत हो तो विकलांगता तरक्की में आड़े नहीं आती। शारीरिक अक्षम पर हुनरमंद खिलाड़ियों ने साबित कर दिया है कि आगे बढ़ने का जोश और जुनून अगर दिल में जगह बना ले तो इंसानी जज्बा हर कामयाबी को अपनी झोली में डाल लेता है।